Part XXI - Temporary, Transitional and Special Provisions • अनुच्छेद

अनुच्छेद 385 Simplified: पहली अनुसूची के भाग ख के राज्यों के अनंतिम विधान-मंडलों के संबंध में उपबंध

यह अनुच्छेद हैदराबाद, मैसूर और त्रावणकोर-कोचीन जैसी पूर्व रियासतों (भाग ख राज्यों) की विधानसभाओं को 1950 से 1952 के बीच राज्य के अनंतिम विधानमंडल के रूप में कार्य करने का अधिकार देता था। इसे 1956 में निरस्त किया गया।

Official Text

[पहलि अनु सू ची के भाग ख मि के राज्यि के अन्तकार्लनि विधान-मंडलि के बारे मि उपबंध ।]–संविधान (सातवां संशोधन) अधिनियम, 1956 कि धारा 29 और अनु सू ची द्वारा (1-11 -1956 से) लोप किया गया ।

Simple Meaning

यह अनुच्छेद हैदराबाद, मैसूर और त्रावणकोर-कोचीन जैसी पूर्व रियासतों (भाग ख राज्यों) की विधानसभाओं को 1950 से 1952 के बीच राज्य के अनंतिम विधानमंडल के रूप में कार्य करने का अधिकार देता था। इसे 1956 में निरस्त किया गया।

Explain Like Ten

यह नियम पुरानी रियासतों (राजा-रजवाड़ों के राज्यों) के नेताओं को चुनाव होने तक राज्यों के लिए नियम बनाने की इजाजत देता था।

Student Mode

अनुच्छेद 385 भाग ख के राज्यों (पूर्व रियासती संघों) में विधायी निरंतरता बनाए रखने के लिए एक संक्रमणकालीन प्रावधान था। इसके तहत वहां की तत्कालीन विधायी संस्थाओं को अनंतिम विधानसभा माना गया, जिसे 7वें संशोधन (1956) द्वारा निरस्त किया गया।

Example

जब तक मैसूर में पहली बार 1952 में चुनाव नहीं हुए, तब तक रियासत काल की अंतरिम सभा ही राज्य का विधानमंडल रही, जिसे इस अनुच्छेद से कानूनी दर्जा मिला।

Key Takeaway

रियासतों के विलय के बाद वहां की पूर्व सभाओं को अस्थायी रूप से चलाने वाला निरसित नियम।

FAQs

भाग ख के राज्यों के लिए अनंतिम विधानमंडलों का क्या अर्थ था?

विलय की गई रियासतों की पुरानी सभाओं को ही नए चुनाव होने तक कानून बनाने का अधिकार देना।

Quiz

रियासतों से बने भाग ख के राज्यों के लिए अनंतिम विधानमंडलों की व्यवस्था करने वाला कौन सा अनुच्छेद 1956 में हटाया गया?

Answer: अनुच्छेद 385

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