Part XXI - Temporary, Transitional and Special Provisions • अनुच्छेद

अनुच्छेद 383 Simplified: प्रांतों के राज्यपालों के संबंध में उपबंध

यह अनुच्छेद स्वतंत्रता के तुरंत बाद 26 जनवरी 1950 को ब्रिटिश-कालीन प्रांतीय राज्यपालों को नए भारतीय राज्यों के अनंतिम राज्यपाल बनाने का प्रावधान करता था। इसे 1956 के 7वें संशोधन द्वारा हटाया गया।

Official Text

[प्रान्ति के राज्यपालि के बारे मि उपबंध ।]–संविधान (सातवां संशोधन) अधिनियम, 1956 कि धारा 29 और अनु सू ची द्वारा (1-11 -1956 से) लोप किया गया ।

Simple Meaning

यह अनुच्छेद स्वतंत्रता के तुरंत बाद 26 जनवरी 1950 को ब्रिटिश-कालीन प्रांतीय राज्यपालों को नए भारतीय राज्यों के अनंतिम राज्यपाल बनाने का प्रावधान करता था। इसे 1956 के 7वें संशोधन द्वारा हटाया गया।

Explain Like Ten

यह नियम पुरानी सरकार के बड़े अधिकारियों को नई सरकार के लागू होने पर भी अपने पद पर काम करते रहने के लिए बनाया गया था।

Student Mode

अनुच्छेद 383 ब्रिटिश भारत के प्रांतों के राज्यपालों को गणतंत्र के प्रारंभ पर संबंधित राज्यों के अनंतिम राज्यपाल के रूप में कार्य करने का अधिकार देता था। इसे 1956 में 7वें संविधान संशोधन द्वारा निरस्त किया गया।

Example

1950 में मद्रास प्रांत के ब्रिटिश गवर्नर तुरंत नए मद्रास राज्य के अनंतिम राज्यपाल बन गए ताकि कामकाज चलता रहे।

Key Takeaway

राज्यपाल पद की निरंतरता सुनिश्चित करने वाला एक संक्रमणकालीन निरसित अनुच्छेद।

FAQs

अनुच्छेद 383 का मुख्य कार्य क्या था?

यह प्रांतीय राज्यपालों के पद को नए स्वतंत्र राज्यों के राज्यपालों में स्थानांतरित करने का संक्रमणकालीन प्रावधान था।

Quiz

प्रांतों के राज्यपालों को स्वतंत्र भारत के राज्यों के राज्यपाल के रूप में बने रहने की अनुमति देने वाला कौन सा अनुच्छेद 1956 में निरस्त किया गया था?

Answer: अनुच्छेद 383

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