Part XI - Union-State Relations • अनुच्छेद
अनुच्छेद 255 Simplified: सिफारिशों और पूर्व मंजूरियों को केवल प्रक्रिया के विषय मानना
अनुच्छेद 255 यह तय करता है कि केवल छोटी प्रक्रियात्मक गलतियों (जैसे राज्यपाल या राष्ट्रपति की पहले से ली जाने वाली सिफारिश या मंजूरी का न होना) के कारण संसद या राज्य विधानसभा द्वारा पारित किसी भी कानून को अदालत द्वारा अमान्य घोषित नहीं किया जा सकता, बशर्ते कि उस कानून को अंतिम रूप से राज्यपाल या राष्ट्रपति की मंजूरी (हस्ताक्षर) मिल चुकी हो।
Official Text
सिफारिशि और पू वर् मंजू रि के बारे मि अपेिाओं को के वल प्रक्रिया के विषय मानना – यदि संसद् के या *** किसी राज्य के विधान-मंडल के किसी अधिनियम को – ु सू ची द्वारा (1 -11-1956 से) “पहलि अनु सू ची के भाग क या भाग ख मि विनिदिर्ष्ट” शब्दि और अरिि का लोप किया गया । (क) जहां राज्यपाल कि सि फारिश अपेिति थी वहां राज्यपाल या राष्ट्रपति ने, (ख) जहां राजप्रमु ख कि सिफारिश अपेिति थी वहां राजप्रमु ख या राष्ट्रपति ने, (ग) जहां राष्ट्रपति कि सिफारिश या पू वर् मंजू रि अपेिति थी वहां राष्ट्रपति ने, अनु मति दे दि है तो ऐसा अधिनियम और ऐसे अधिनियम का कोई उपबंध के वल इस कारण अविधिमान्य नहीं होगा कि इस संविधान द्वारा अपेिति कोई सिफारिश नहीं कि गई थी या पू वर् मंजू रि नहीं दि गई थी ।
Simple Meaning
अनुच्छेद 255 यह तय करता है कि केवल छोटी प्रक्रियात्मक गलतियों (जैसे राज्यपाल या राष्ट्रपति की पहले से ली जाने वाली सिफारिश या मंजूरी का न होना) के कारण संसद या राज्य विधानसभा द्वारा पारित किसी भी कानून को अदालत द्वारा अमान्य घोषित नहीं किया जा सकता, बशर्ते कि उस कानून को अंतिम रूप से राज्यपाल या राष्ट्रपति की मंजूरी (हस्ताक्षर) मिल चुकी हो।
Explain Like Ten
यह नियम कहता है कि यदि संसद या राज्य सरकार ने कोई नया कानून बनाया है, और वे शुरू में राज्यपाल या राष्ट्रपति से पूछना (अनुमति लेना) भूल गए, लेकिन बाद में राज्यपाल या राष्ट्रपति ने उस कानून पर साइन कर दिए, तो वह कानून पूरी तरह से सही माना जाएगा। छोटी सी भूल के कारण कानून को रद्द नहीं किया जाएगा।
Student Mode
अनुच्छेद 255 विधायी प्रक्रिया में प्रक्रियात्मक अनियमितताओं के उपचार (Procedural Irregularities Cure) का सिद्धांत स्थापित करता है। यदि संविधान के तहत किसी विधेयक को प्रस्तुत करने हेतु राष्ट्रपति या राज्यपाल की पूर्व सिफारिश या मंजूरी (Previous Recommendation or Sanction) अनिवार्य थी और वह प्रक्रिया छूट गई, तो भी कानून अमान्य नहीं होगा यदि उसे अंततः आवश्यक प्राधिकारी की सहमति (Final Assent) प्राप्त हो गई हो। यह विधायी कार्यों को तकनीकी त्रुटियों के आधार पर निरस्त होने से बचाता है।
Example
यदि किसी राज्य का टैक्स लगाने वाला विधेयक विधानसभा में पेश करने से पहले राज्यपाल की सिफारिश लेनी जरूरी थी, लेकिन जल्दबाजी में वह बिना सिफारिश के पास हो गया। बाद में राज्यपाल ने उस कानून पर हस्ताक्षर कर अपनी अंतिम मंजूरी (Assent) दे दी। ऐसी स्थिति में, अनुच्छेद 255 के तहत वह कानून वैध रहेगा और प्रक्रिया की इस छोटी सी कमी के कारण रद्द नहीं होगा।
Key Takeaway
अनुच्छेद 255 यह सुनिश्चित करता है कि कानून बनाने की प्रक्रिया में प्रारंभिक सिफारिशों की कमी जैसी छोटी तकनीकी या प्रक्रियात्मक त्रुटियों के कारण कोई कानून रद्द न हो, यदि उसे अंतिम मंजूरी मिल चुकी हो।
FAQs
क्या पूर्व सिफारिश न मिलने पर कोई कानून अमान्य हो जाता है?
नहीं, यदि विधेयक को बाद में संबंधित राज्यपाल या राष्ट्रपति की अंतिम सहमति मिल गई हो, तो वह कानून केवल पूर्व सिफारिश न मिलने के कारण अमान्य नहीं होता है।
अनुच्छेद 255 के पीछे मुख्य उद्देश्य क्या है?
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विधायी प्रक्रिया की छोटी प्रक्रियात्मक भूलों के कारण महत्वपूर्ण कानूनों को निरस्त न होना पड़े।
Quiz
अनुच्छेद 255 के अनुसार, विधायी प्रक्रिया में पूर्व मंजूरी या सिफारिश न मिलने को क्या माना जाएगा?
Answer: केवल प्रक्रिया का विषय (तकनीकी त्रुटि)
यदि राज्यपाल की सिफारिश आवश्यक थी, तो विधेयक को अंतिम रूप से किसकी सहमति मिलने पर वह कानून वैध रहेगा?
Answer: राज्यपाल या राष्ट्रपति की